Sunday, December 29, 2013

दिल्लीवासियों का दुर्भाग्य: कांग्रेस व् “आप” का अनूठा मिलन

कुछ लोग इस लेख के शीर्षक से असहमत हो सकते हैं, किन्तु जब अपने आपको भारत की एकमात्र इमानदार व् स्वच्छ राजनितिक दल बताने वाली पार्टी, निर्विवाद रूप से देश या संभवतः विश्व की सबसे भ्रष्ट पार्टी होने की उपाधि प्राप्त करने वाली पार्टी कांग्रेस के साथ गठजोड़ कर सरकार बना ले, तो मेरे विचार से इस शीर्षक को अनुचित तो नहीं कहा जा सकता.....

हम सबको स्मृत होगा जब अबसे लगभग दो वर्ष पूर्व कांग्रेस सरकार के एक के बाद एक घोटाले निकल कर सामने आ रहे थे चाहे व् कॉमनवेल्थ हो, टू जी हो, कोयल घोटाला हो, सेना के उपकरणों जैसे टाट्रा ट्रक घोटाला हो, एयर इण्डिया को षड्यंत्र द्वारा नष्ट करना हो, थोरियम घोटाला हो या अन्य घोटाले, कांग्रेस निरंतर अनैतिक व् अनुचित नीतिगत निर्णय लेती चली जा रही थी, चाहे वो पी.जे थॉमस की नियुक्ति हो, चीनी व् प्याज का निर्यात हो, इसरो देवास की ओर बढ़ाये गए पग हों, टू जी व् कोयला घोटाले की जांच से पीछे हटना हो, कॉमनवेल्थ घोटाले के आरोपियों का बचाव हो, और वहीँ दूसरी ओर कांग्रेस के मंत्रियों द्वारा अपने बचाव के लिए मूर्खतापूर्ण तर्क दिए जा रहे थे जिसने देश के नागरिकों के मन में यूपीए व् कांग्रेस के विरोध में रोष भर दिया दिया था,

तत्पश्चात जब अन्ना व् रामदेव का दिल्ली में आन्दोलन हुआ तो जनता की भागीदारी से यह स्पष्ट हो गया की जनता कांग्रेस के कुशासन से कितनी त्रस्त हो चुकी थी, किन्तु कांग्रेस ने जिस प्रकार इन आन्दोलनों को कुचलने का प्रयास किया चाहे वो अन्ना को बंदी बनाना हो या मध्य रात्री में भजन गाते अनशनरत भूखे राम देव समथकों कर लाठी चलाना हो, या दामिनी के लिए न्याय मांगने राष्ट्रपति भवन के बाहर एकत्र हुए युवाओं पर आंसू गैस के गोले, ठण्ड में पानी की बौछार, रब्बर की गोलियां व् लाठीचार्ज करना हो, इन सब घटनाओं ने जनता को कुपित कर दिया था और जनता ने कांग्रेस को अपने कोप का भाजन बनाने का निर्णय मन ही मन ले लिया था,

किन्तु उसी समय लोगों के मध्य आन्दोलन में भाग लेने वाले चर्चित चेहरे केजरीवाल, मनीष सिसोदिया योगेन्द्र यादव, शाजिया इल्मी, संजय सिंह, प्रशांत भूषण व् गोपाल राय एक राजनितिक दल बनाने का निर्णय ले चुके थे, निर्णय बहुत ही सोच समझकर लिया गया था, क्योंकि सभी बड़े आन्दोलन जो दिल्ली में हुए थे उनमें से अधिकतर आन्दोलनों में इन लोगों की भागीदारी थी और दिल्ली में इनका संगठन खड़ा हो चुका था, और यह लोग समझ चुके थे की वे जनता का विशवास जीत चुके हैं, परन्तु जब राजनितिक पार्टी बनाने की बात हुई तो केजरीवाल के गुरु अन्ना हजारे जिनकी छत्रछाया में ये इनका आन्दोलन आगे बढ़ा था ने स्पष्ट किया की वे राजनीति में नहीं आयेंगे क्योंकि वह ऐसा न करने के लिए जनता को वचन दे चुके हैं,

वैसे तो केजरीवाल व् उनके सभी साथी चाहे वो प्रशांत भूषण, हों शाजिया इल्मी हों, मनीष सिसोदिया हों संजय सिंह हो, गोपाल राय हो या योगेन्द्र यादव हो यह सब असंख्य बार यह कह चुके थे की उनके मन में कोई राजनितिक आकांक्षाएं नहीं है, और सम्भवतः इसी कारण इनके आन्दोलन को जनता का अपार समर्थन भी मिला, किन्तु उसके पश्चात भी अपने वचन का पालन न करते हुए यह राजनीति में आये, किन्तु मुझे इनके राजनीती में आने से कोई समस्या नहीं है, यह तो हर व्यक्ति का लोकतान्त्रिक अधिकार है की वह राजनीती में पदार्पण कर सकता हैं, मुझे यदि आपत्ति है तो इनके विरोधाभासी वक्तव्यों से, 

दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ने का निर्णय लेने के पश्चात केजरीवाल व् इनके साथियों ने चुनाव प्रचार में यह प्रचारित करने का प्रयास किया की केवल केजरीवाल की आम आदमी पार्टी “आप” ही इमानदार हैं, और कांग्रेस व् भाजपा में गठजोड़ है और यह दोनों ही पूर्णतः भ्रष्ट हैं, केजरीवाल सदैव कहते रहे की कभी इन दोनों दलों से हाथ नहीं मिलायेंगे, यह बात तो केजरीवाल ने अपने बच्चों की कसम खाकर कही थी की न कांग्रेस व् भाजपा को समर्थन देंगे न लेंगे
video 
http://www.youtube.com/watch?v=yOutxpoXnfg&feature=youtu.be

किन्तु जिस व्यक्ति ने अपने बच्चों की कसम का मान न रखा वह अपने अन्य वचनों व् दिल्ली की जनता की अपेक्षाओं का कितना मान रखेगा इसका उत्तर तो समय ही दे सकेगा,

अब ध्यान दें की जनता को अपनी ओर आकर्षित करने हेतु राजनितिक व् चुनावी लाभ के लिए “आप” के द्वारा बिना अध्यन व् विचार किये बिना सोचे समझे बड़े बड़े चुनावी वचन दिए गए, जिनमें

>बीजली के दाम आधे करने की बात कही गयी अब कहा जा रहा है की पहले ऑडिट होगा फिर जो परिणाम आयेंगे उसके अनुसार दाम कम होंगे पूरी प्रक्रिया में ४-५ माह लग सकते हैं,

>हर दिल्लीवासी को सात सौ लिटर पानी देने के लिए कहा गया अब कह रहे हैं जहाँ पानी की अत्यधिक समस्या है वहां पानी उपलब्ध करवाया जायेगा,

>पांच सौ नए स्कूल व् चिकित्सालय खोलने की बात कही गयी किन्तु किस प्रकार और फंड के विषय में कोई बात जनता को अब तक स्पष्ट रूप से नहीं बताई गयी,

>महिलाओं की सुरक्षा के लिए कमांडो फ़ोर्स के गठन की बात कही गयी किन्तु यह फ़ोर्स क्या होगी? गठन कैसे होगा उस प्रक्रिया पर भी रहस्यमयी चुप्पी हैं,

>तीन लाख पचार हजार अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी सरकारी रोजगार देने की बात कही गयी, फिर कहा गया नहीं कुछ विभागों के कर्मचारियों को स्थायी करेंगे,

>जनलोकपाल बिल लाने जैसे आश्वासन दिए गए किन्तु वह केवल लोकसभा में पारित हो सकता था,  और अब लोकायुक्त के लिए भी संवेधानिक अड़चन की बात कही जा रही है

जैसे वचन सम्मिलित हैं,

इसके पश्चात कुछ स्टिंग ओपरेशन भी सामने आये जिसमें शाजिया इल्मी व् “आप” के कई अन्य बड़े नेता अनैतिक रूप से चंदा लेते दिखे व् कुछ उम्मीदवार तो चुनाव जीतने के पश्चात अपनी शक्ति का दुरूपयोग कर धन के बदले लोगों को लाभ पहुँचाने तक की बात करते हुए कैमरे पर दिखे, 

परन्तु “आप” और केजरीवाल जो दूसरों पर अनैतिक कृत्यों में सम्मिलित होने का आरोप लगाते नहीं थकते थे उन्होंने इस सबको एक राजनितिक षड्यंत्र का भाग बताया, व् अपना पल्ला झाड लिया, इन सब घटनाओं ने यह सुनिश्चित कर दिया की अपने आपको दूसरों से अलग बताने वाले केजरीवाल व् “आप” कोई पवित्र गाय नहीं है बल्कि वह भी उन्ही राजनितिक दलों में से एक हैं जिनका विरोध कर वे इस स्थान तक पहुंचे हैं,

किन्तु जैसे यह भी पर्याप्त नहीं था तो अल्पसंख्यकों विशेषकर मुस्लिमों के वोट पाने के लिए बरेली दंगों के आरोपी मौलाना तौकीर रजा से लेकर बहुसंख्यकों के विरुद्ध विष वमन करने वाले जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी तक से समर्थन लिया गया और उनसे अपने लिए चुनाव प्रचार करवाया गया, और यह तक कहा गया की की मुस्लिमों को ग्यारह प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए, जब यह सर्वविदित है की धार्मिक आधार पर आरक्षण संविधान के विरुद्ध है,

अब युवा पीड़ी को साधने के लिए जिन व्यक्तियों को राजनीती की समझ तक नहीं थी जो टीवी पर अभद्र व् अशिष्ट भाषा के लिए जाने जाते हैं उन्हें बुलाकर युवाओं को लुभाने के लिए उनसे प्रचार करवाया गया व् इन टीवी कलाकारों से ऐसी भाषा व् शब्दों का प्रयोग करवाया गया जिसे सभ्य व् शालीन की संज्ञा नहीं दी जा सकती, सम्भवतः आज के परिपेक्ष में यह कोई बड़ा विषय नहीं है, परन्तु जो अपने आपको सर्वश्रेष्ठ राजनितिक दल बताते हों उनसे इस प्रकार के कृत्य की अपेक्षा नहीं की जा सकती

अब विडंबना देखिये की "आप" के समर्थकों और "आप" के नेताओं की विचारधारा में स्वयं कितना विरोधाभास है की मल्टीनेशनल में कार्यरत युवा जो इनका झंडा उठा कर प्रचार कर रहा था जो की आरक्षण, साम्य्वादिता व् सम्प्रदायिकता व् तुष्टिकरण का धुर विरोधी है वह भी इनका साम्यवादी व् साम्प्रदायिक दृष्टिकोण समझने में असमर्थ रहा की यहाँ तो उनका पार्टी के नेतृत्व की विचारधारा का सीधा टकराव है, किन्तु उस वर्ग के मन पर ये ऐसी छाप छोड़ चुके थे की उसने इनके द्वारा प्रयोग किये हर कूटनीति व् हथकंडे पर कभी कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया वे इनके हर तर्क को बिना किसी वितरक के स्वीकार करते चले गए

सम्भवतः राजनितिक रूप से अपरिपक्व मतदाताओं ने कांग्रेस के प्रति उपजे आक्रोश में दिल्ली में हुए आन्दोलनों में इनके प्रति उपजी सहानुभूति के कारण इनकी विचारधारा का मुल्यांकन ही नहीं किया, और भावनाओं के बहाव में आकर “आप” को अपार समर्थन प्रदान किया और परिणाम स्वरुप “आप” ने दिल्ली विधानसभा के चुनावों में अट्ठाईस सीटें जीतकर इतिहास रच दिया.

किन्तु इसके पश्चात जो घटनाक्रम धटित हुआ वह अप्रत्याशित था, भाजपा ने बत्तीस सीटें होने के बाद विपक्ष में बैठने का निर्णय लिया और कांग्रेस ने लेफ्टिनेंट गवर्नर को “आप” को समर्थन देने का पत्र दे दिया, फिर केजरीवाल ने अपना एक निजी जनमत संग्रह करवाया जिसकी प्रमाणिकता को शंकास्पद होने से नकारा नहीं जा सकता उस जनमत संग्रह में यह दावा किया गया की दिल्ली की जनता सरकार बनाने के पक्ष में हैं, किन्तु रहस्यमयी रूप से जनता से यह नहीं पुछा गया की क्या “आप” को कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनानी चाहिए? किन्तु इसके पश्चात अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री बनने का निर्णय लिया और मुख्यमंत्री पद की शपथ ली...

कई लोग मुझपर नकारात्मक दृष्टिकोण होने का आरोप लगा सकते हैं, किन्तु सम्भवतः इन लोगों ने भारतीय राजनीती के इतिहास का अध्यन नहीं किया है, क्योंकि एक काल खंड में लालू यादव भी घोर कांग्रेस-विरोधी हुआ करते थे रिक्शे से विधानभवन जाया करते थे, और लालू उस समय पिछड़ों व् गरीबों के मसीहा के रूप में जाने जाते थे किन्तु वही मसीहा कब देश के सबसे भ्रष्ट नेता में सम्मिलित हो गया लोग समझ ही नहीं पाए, और अब  राजनितिक लाभ के लिए लालू उसी कांग्रेस से जा मिले जिसके वो विरोधी हुआ करते थे,

वही स्थिति चिरंजीवी की प्रजाराज्यम के साथ हुई, विश्वनाथ प्रताप सिंह भी कांग्रेस के धुर विरोधी हुआ करते थे, किन्तु प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस से समर्थन लेते रहे और उसी वी.पी सिंह ने भारतियों को अगड़े, पिछड़ों, अनुसूचित जाती व् अनुसूचित जनजाति की खाईयों में ऐसा बांटा की अब देश की एकता ही संकट में आ खड़ी हुई है, ऐसे एक नहीं कई उदाहरण है की लोहिया व् जयप्रकाश आन्दोलनों से निकले कई राजनेता जो कांग्रेस के विरोधी हुआ करते थे वे अंत में कांग्रेस से ही मिल गए और अंत में उन्हें समर्थन देने वाली जनता ही छली गयी,

और यहाँ भी मैं उसी राजनितिक इतिहास व् राजनितिक घटनाक्रमों की पुनरावृत्ति होती देख रहा हूँ, की जिस पार्टी ने कांग्रेस के विरुद्ध शुचिता, निष्पक्षता व् निष्कपटता की बात कर चुनाव लड़ा था अब वह सत्ता के लोभ में उसी महाभ्रष्ट कांग्रेस से गठजोड़ कर चुकी हैं और पुनः भारत की जनता व् मतदाता छले गए हैं, और विडंबना यह है की अधिकतर आम आदमी जिन्होंने इन्हें वोट दिया था वो अभी तक इस कटु सत्य से अनभिग्य हैं और इस सत्य को स्वीकारने के लिए उद्यत नहीं हैं

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