Thursday, March 27, 2014

आम आदमी पार्टी का बांग्लादेशी घुसपैठियों के प्रति अथाह प्रेम

क्या कभी आम आदमी पार्टी के किसी नेता ने कश्मीरी पंडितों को पुनः उनके घर उनकी भूमि वापस दिलवाने की बात कही है ?

क्या असम में बंगलादेशी मुसलमानों द्वारा विस्थापित किये गए बोडो हिन्दुओं को उनके घर व् भूमि दिलवाने की बात कही है ?

मैंने वह सब तो नहीं सुना किन्तु भारत में वैध रूप से घुस आये बंगलादेशी घुसपैठियों के प्रति आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह के मन में कितनी दया है वह यह वीडियो देखकर आप अनुमान लगा लें की,
उन्हें अपने देश के मूल निवासियों की चिंता नहीं है जिन्हें इन्ही बांग्लादेशियों ने विस्थापित किया है, किन्तु इन्हें चिंता केवल बंगलादेशी मुसलमान घुसपैठियों की है जो भारत के मूल निवासियों के अधिकारों पर कुंडली मार कर बैठे हुए हैं

केजरीवाल के दोहरे मापदंड

कल मोदी ने अरविन्द केजरीवाल पर शाब्दिक बाण चलाये और उन्हें व् उनकी पार्टी को पाकिस्तान का एजेंट कहा, जिसके प्रत्युत्तर में केजरीवाल अपने भगोड़े आचरण पर आ गए और बोले “ऐसी भाषा मोदी को शोभा नहीं देती है”


अब बहोत से बुद्धिजीवी यहाँ तक की राजनितिक पंडित भी केजरीवाल के इस वक्तव्य का समर्थन करते दिखे, जिनको लगता है राजनीती में यह भाषा उचित नहीं, उन्हें मेरा सुझाव है की यथार्थ को स्वीकारना सीखें, यह बातें एक आदर्श समाज में उचित हो सकतीं है, किन्तु यह कोई आदर्श समाज नहीं है, और आपका प्रतिद्वंदी जिस शैली व् भाषा में आपपर आक्रमण कर रहा हो उसे तथ्यपरक उत्तर उसीकी भाषा व् शैली में देने में क्या अनुचित है ?  
कई पत्रकार मोदी को प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार होने के कारण ऐसी भाषा से बचने का सुझाव दे रहे है,   किन्तु क्या मैं जान सकता हूँ की इतने लम्बे समय से केजरीवाल जो मोदी पर निरंतर झूठे अनर्गल आरोप लगाते आ रहे है जिनका न कोई सर होता है न पैर, पहले कहते है गुजरात में ८०० किसानों ने आत्महत्या की, अगले हफ्ते यह आंकड़ा ५८०० बताते है,
कभी मोदी को अम्बानी का दलाल बोलते हैं कभी अदानी का, तो क्या यह भाषा उचित है ?, 
केजरीवाल स्वयं एक मिडिया हॉउस द्वारा प्रायोजित निजी विमान से यात्रा करते है,किन्तु मोदी द्वारा चुनाव प्रचार में हैलिकोप्टर प्रयोग करने पर प्रश्न उठाते है, 
केजरीवाल मीडिया पर मोदी द्वारा खरीदे जाने का आरोप लगाते है, और आजतक व् पुन्य प्रसून बाजपेयी के साथ मीडिया फिक्सिंग का वीडियो केजरीवाल का लीक होता है.....

वैसे मोदी द्वारा अपने ऊपर हुए इस तीखे आक्रमण से बिलबिलाये केजरीवाल मोदी को मुद्दे की बात करने की सीख देते दिखे, लगता है केजरीवाल समझते है की वो जो चाहें आरोप लगायें मोदी को उत्तर नहीं देना चाहिए ? 
वैसे क्या यह सच नहीं की “आम आदमी पार्टी” की वेबसाईट में कश्मीर को पाकिस्तान का भाग दिखाया गया है? 
क्या यह सच नहीं है कि आम आदमी पार्टी के नेता प्रशांत भूषण कश्मीर पाकिस्तान को देने के समर्थक हैं? 
क्या यह सच नहीं है कि आम आदमी पार्टी के प्रोफेसर चेनाय कसाब और अफजल गुरू जैसे आतंकवादियों को निर्दोष बताते हैं और अलगाववादियों को मिल कर भारत के विरोध लड़ने का आव्हान करते है? यही चेनॉय आईएसआई से धन व् सुविधाएं लेकर पाकिस्तान पर कश्मीर के दृष्टिकोण का कई अन्तरराष्ट्री सेमिनारों में समर्थन करते रहे हैं ?
क्या यह भी सच नहीं की पाकिस्तान में "आम आदमी पार्टी" को चंदा व् चुनाव के लिए धन उपलब्ध करवाने का अभियान हफीज सईद द्वारा चलवाया जा रहा है ?

यदि यह सच है तो केजरीवाल व् "आम आदमी पार्टी" को पाकिस्तान का एजेंट बोलना कहा से अनुचित है ?

मित्रों कूटनीति के सबसे बड़े गुरु यदि हुए, तो वो भगवान कृष्ण ही थे, और एक बार शिशुपाल व् कृष्ण का प्रसंग याद करिए, कृष्ण ने शिशुपाल की १०० भूलें क्षमा की थी, परन्तु १०१वीं भूल पर उसका वध किया था, कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में यह सन्देश दिया की नैतिकता व् नियमों का पालन उसके साथ करो, जो स्वयं इनका पालन करता रहा हो, अतः जो केजरीवाल स्वयं नैतिकता को कोई महत्व न देता हो, झूठे व् मिथ्या आरोप लगाता फिरता हो, उसके सत्य व् उसके कर्मों को जनता के सामने रखना कौन सी अनुचित बात है ? 
जहाँ तक भाषा की बात है तो केजरीवाल को तो कम कम से कम भाषा की मर्यादा की दुहाई देने का कोई अधिकार नहीं, 
केजरीवाल की भाषा की मर्यादा तब कहाँ थी जब मोदी को मनघडंत व् झूठे आरोप लगाकर पूंजीपतियों व् उद्योगपतियों का दलाल कहा था ? 
और आज जब सामने से उत्तर मिला तो मर्यादा याद आ गयी ? 
ये दोहरा आचरण व् मानक क्यों ? 
मानक तो सबके लिए एक समान ही होने चाहिए    

जब तक केजरीवाल ने घोषणा नहीं की थी की वो मोदी के विरुद्ध चुनाव लड़ेंगे तब तक मोदी ने केजरीवाल पर एक शब्द भी नही कहा था किन्तु जब यह स्पष्ट हो चूका है की केजरीवाल अब मोदी का प्रतिद्वंदी है तो अब उसपर आक्रमण करना मोदी का धर्म बनता है, और मोदी अपने उसी धर्म का पालन कर रहे हैं. 

Friday, March 14, 2014

नैतिकता के साथ राजनितिक परिपक्वता का महत्व

नैतिकता के साथ राजनितिक परिपक्वता कितनी महत्वपूर्ण है इसका ज्वलंत उदाहरण अन्ना हजारे की आज की स्थिति व् उनका आज का दिया हुआ वक्तव्य है,

मुझे भली प्रकार याद है की जब मैंने अन्ना द्वारा ममता बनर्जी का समर्थन करने पर एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था “अन्ना के अनुसार किसी व्यक्ति कीशुचिता के मानक क्या है?”
इसपर कई लोगों ने मेरी आलोचना की थी,
किन्तु आज स्वयं अन्ना ने ही यह सत्यापित कर दिया की मैंने अनुचित प्रश्न नहीं उठाये थे

लोगों को स्वयं विचार करना चाहिए की किसी भी बात में कितना तत्व है, उसके पश्चात् ही उसका समर्थन या विरोध करना चाहिए, जैसे अन्ना कहते हैं पार्टी को न देखें चरित्रशील लोगों को वोट दें, किन्तु क्या अन्ना अनभिग्य है की हर विधायक व् सांसद अपने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की बात मानने को बाध्य होता है ?

अतः यदि व्यक्ति ने किसी उम्मीदवार को अच्छा समझ कर भले ही वोट कर दिया, किन्तु उस उम्मीदवार की पार्टी का शीर्ष नेतृत्व ही यदि पक्षपाती अथवा आर्थिक या नैतिक रूप से भ्रष्ट है तो वह उम्मीदवार तो वही करेगा न जो नेतृत्व की आज्ञा होगी, वो उम्मीदवार संसद या विधानसभा में किसी बिल का समर्थन अथवा विरोध आपनी पार्टी नेतृत्व की आज्ञा के अनुसार ही तो करेगा, तो फिर क्या इस प्रकार बिना राजनितिक पार्टी पर ध्यान दिए केवल उम्मीदवार को देखकर वोट देने का सुझाव अनुचित नहीं है ? 

जनता के पास कई साधन उपलब्ध हैं हर राजनितिक दल के विषय में जानकारी एकत्र करने के, उन्हें स्वयं जांच लेना चाहिए की उनकी आशा के अनुरूप कौन सा राजनितिक दल खरा है, उसके पश्चात ही वोट देना चाहिए, न की किसी व्यक्ति के कहे अनुसार !       

Sunday, February 23, 2014

“आम आदमी पार्टी” व् केजरीवाल के दोहरे मापदंड

आजकल केजरीवाल अंबानी को बड़ी गालियाँ दे रहे हैं, और उसी की आढ़ लेकर मोदी से प्रश्न कर भाजपा पर निशाना साधने का प्रयत्न कर रहे हैं किन्तु मैं पूछना चाहूँगा की अम्बानी कौन है ? कोई माओवादी है क्या ? कोई नक्सली है क्या ? कोई पाकिस्तान समर्थक है क्या ? कोई विदेशी संगठन का एजेंट है क्या ? पाकिस्तानी एजेंसी ISI का समर्थक है क्या ISI से पैसा लेता है क्या ? कश्मीर भारत से अलग करने की बात करता है क्या ? कोई सड़कछाप अपराधी है क्या? और यदि केजरीवाल के पास अंबानी के अपराधों के इतने ही साक्ष्य व् प्रमाण उपलब्ध है तो न्यायालय में जाकर केस क्यों नहीं कर देते ? उनकी पार्टी में तो एक से एक बड़े वकील व् कानूनविद भरे पड़े हैं ?

हो सकता है की अपने उद्योग को बढ़ाने के लिए कोई अनुचित निर्णय अंबानी ने लिए हों, मैं उसका समर्थन नहीं करता, और मेरे अनुसार यदि अपराध किया है तो उसे उसका दंड भी मिलना चाहिए,  किन्तु दंड देने का अधिकार न्यायालय को है!

किन्तु क्या इस बात को झुठलाया जा सकता है अंबानी जैसे उद्योगपतियों के कारण आज देश में करोड़ों लोगों को रोजगार मिला हुआ है? आज अंबानी जैसे उद्योगपतियों की वजह से पढ़े-लिखे सुशिक्षित युवाओं को ढंग की सैलरी मिल पा रही है अन्यथा सरकार ने तो जातिगत आरक्षण लागु कर युवाओं के पेट पर लात मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, यदि उद्योगपति न होते तो ये युवा कहाँ जाते ? किसके आगे हाथ फैलाते ? 

अब बात करते है केजरीवाल की और उनकी नीतियों व् पार्टी के लोगों की,


  • “आप” की शाजिया इल्मी ३ वर्षों तक पत्रकार रहीं हैं और उनकी घोषित सम्पत्ति 32 करोड़ की है, क्या केजरीवाल उनसे पूछेंगे की तीन वर्षों में शाजिया ने इतना धन कैसे और कहाँ से कमाया? यदि नहीं तो क्यों नहीं ?  
  • “आप” ने कमल मित्र चिनॉय को पार्टी का सदस्य बनाया जो की पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI से धन लेकर कश्मीर पर पाकिस्तान के दृष्टिकोण का समर्थन करने वाली सेमिनार में जाकर पाकिस्तान के पक्ष में बोलते थे, और नक्सल समर्थक है वाही नक्सली जो असंख्य निर्दोषों की बर्बरता पूर्वक हत्याएं कर चुके हैं.  
  • “आप” की सदस्य अंजलि दमानिया मीडिया में कहती हैं की उनकी पार्टी में दाउद इब्राहीम जैसे आतंकवादी और अरुण गवली जैसे माफिया का स्वागत है, यही अंजलि दमानिया स्वयं किसानों की कृषि भूमि कौड़ियों के दाम पर खरीद कर उसे बाजार भाव पर बेचकर करोड़ों कमाती हैं, 
  • “आप” ने बस्तर से सोनी सोरी को टिकट दिया है जो की एक नक्सली है, कई निर्दोषों की हत्या की आरोपी है, और उसके ऊपर राष्ट्र के विरुद्ध देशद्रोह और राष्ट्र के विरुद्ध युद्ध छेड़ने जैसे गंभीर मुक़दमे हैं, 
  • “आप” सार्वजानिक रूप से खाप पंचायत का समर्थन करती है, वही खाप पंचायतें जो असंवैधानिक है और महिलाओं से सामूहिक बलात्कार करने जैसे फरमान देती रहीं है, 
  • “आप” कहती है की दिल्ली में कालेजों की 90% सीटें केवल दिल्ली के निवासियों के लिए आरक्षित होंगी, यह छेत्रवाद व् भेदभाव नहीं तो और  क्या है ? क्या केजरीवाल व् "आप" इसे राष्ट्रिय सोच की संज्ञा देते  है? 
  • “आप” व् केजरीवाल इमाम बुखारी की शरण में जाकर उनसे समर्थन मांगते हैं, जो की पाकिस्तान समर्थक ही नहीं बल्कि इमाम बुखारी सार्वजानिक रूप से ये कह चुके हैं की वह ISI एजेंट है, 
  • “आप” अपना प्रचार करने के लिए निर्दोष निरपराध हिन्दुओ के हत्यारे व् बरेली दंगों के सूत्रधार तौकीर रजा को बुलाकर उनसे समर्थन मांगते हैं, और अपना प्रचार करवाते हैं, क्या यह "आप" के सर्वधर्म सम्भाव का उदाहरण है? 
  • “आप” के ऊपर विदेश से मुख्यतः पाकिस्तान व् अमेरिका द्वारा अवैध रूप से धन प्राप्त करने का केस उच्च-न्यायलय में चल रहा है क्या इसपर केजरीवाल कुछ कहेंगे?

अतः जनता को सोच समझकर निर्णय लेना चाहिए की वह किसका समर्थन करें... राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त लोगों से भरी पार्टी का या राष्ट्र के प्रति समर्पित पार्टी का !!            

अन्ना के अनुसार किसी व्यक्ति की शुचिता के मानक क्या है?


क्या मैं यह प्रश्न करने की धृष्टता कर सकता हूँ की अन्ना हजारे के अनुसार किसी की शुचिता व् ईमानदारी के मानक क्या हैं? यह प्रश्न लोगों को अनुचित लग सकता है किन्तु लोकतंत्र में अन्य लोगों के समान मुझे भी अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार तो है ही, किन्तु उसके पूर्व मैं यह अवश्य स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की मैं निजी रूप से अन्ना हजारे का पूरा सम्मान करता हूँ, किन्तु मैं यह अवश्य जानना चाहता हूँ की क्या उनके अनुसार किसी व्यक्ति की ईमानदारी व् शुचिता की परिभाषा क्या मात्र आर्थिक ईमानदारी तक सीमित है ? क्या अन्ना की शुचिता की परिभाषा में नैतिक शुचिता का कोई स्थान नहीं ?




  •  बंगाल में मस्जिदों के इमाम व् चर्च के पादरी को ममता सरकार वेतन  देती है, किन्तु मंदिर के पुजारियों को नहीं

  • बंगाल में मुस्लिमों के लिए कई योजनायें चल रही हैं, किन्तु हिन्दुओं के लिए ऐसी कोई सुविधा नहीं है,   भेदभाव क्यों ?

  • ममता सरकार ने विश्व का ऐसा अनूठा चिकित्सालय बनाने का प्रस्ताव दिया था जहाँ केवल मुस्लिमों का   उपचार हो, वो तो चारों ओर से हुई आलोचना से अपने पग पीछे खींचने पड़े

  •  ममता सरकार बंगलादेशी घुसपैठियों व् बर्मा के रोहिंगियाई मुस्लिमों के विरुद्ध कोई कार्यवाही क्यों नहीं   करती जबकी ममता भली प्रकार जानती हैं की ये लोग अवैध रूप से बंगाल में रहकर बंगाल के   मूल निवासियों के अधिकारों का दोहन कर रहे हैं

  •  बंगाल में इस्लामिक कट्टरपंथता बढती जा रही है , डेढ़ वर्ष पूर्व बंगाल में मुस्लिमों द्वारा हिन्दुओं के गाँव   पर किये गए आक्रमण व् हिन्दुओं के लगभग २०० घरों व् अन्य सम्पत्ति को जला देने के विषय   में आरोपियों के विरुद्ध ममता सरकार ने क्या कार्यवाही की है?

  • क्या अन्ना बंगाल में हुए 2500 करोड़ के शारदा चिटफंड घोटाले से अनभिग्य हैं ? जिसमें ममता बनर्जी के १३ नेताओं का नाम आया था जिनमें कुनाल घोष, मुकुल रॉय, टूटू बोस, उनके पुत्र श्रीन्जोय व् शौमिक, रजत मजुमदार शुभेंदु अधिकारी, मदन मित्र, कृष्णा चक्रवर्ती, समीर चक्रवर्ती, के.डी सिंह व् आसिफ खान जैसे तृणमूल के मंत्री व् वरिष्ठ सदस्य शामिल हैं और अब तक उनपर ममता बनर्जी ने कोई कार्यवाही नहीं की हैं, और यदि अन्ना इससे अवगत हैं तो क्या वो स्वयं एक भ्रष्ट नेत्री का साथ नहीं दे रहे हैं ? 
अब यदि यह सब बातें सत्य हैं, तो फिर ममता बनर्जी को लोकसभा चुनाव में समर्थन व् ममता के पक्ष में प्रचार क्यों ? क्या अन्ना इससे अनभिग्य हैं की बंगाल में ममता सरकार मुस्लिम और हिन्दुओं में प्रत्यक्ष रूपसे भेद भाव करती है ? किन्तु यदि अन्ना हजारे के लिए व्यक्ति की नैतिक शुचिता का कोई महत्व नहीं केवल हवाई चप्पल पहनना व् आर्थिक रूप से इमानदार होना ही सबकुछ है, भले ही वह राजनितिक स्वार्थ हेतु धार्मिक आधार पर भेदभाव करता हो तो अलग विषय है….

Sunday, December 29, 2013

दिल्लीवासियों का दुर्भाग्य: कांग्रेस व् “आप” का अनूठा मिलन

कुछ लोग इस लेख के शीर्षक से असहमत हो सकते हैं, किन्तु जब अपने आपको भारत की एकमात्र इमानदार व् स्वच्छ राजनितिक दल बताने वाली पार्टी, निर्विवाद रूप से देश या संभवतः विश्व की सबसे भ्रष्ट पार्टी होने की उपाधि प्राप्त करने वाली पार्टी कांग्रेस के साथ गठजोड़ कर सरकार बना ले, तो मेरे विचार से इस शीर्षक को अनुचित तो नहीं कहा जा सकता.....

हम सबको स्मृत होगा जब अबसे लगभग दो वर्ष पूर्व कांग्रेस सरकार के एक के बाद एक घोटाले निकल कर सामने आ रहे थे चाहे व् कॉमनवेल्थ हो, टू जी हो, कोयल घोटाला हो, सेना के उपकरणों जैसे टाट्रा ट्रक घोटाला हो, एयर इण्डिया को षड्यंत्र द्वारा नष्ट करना हो, थोरियम घोटाला हो या अन्य घोटाले, कांग्रेस निरंतर अनैतिक व् अनुचित नीतिगत निर्णय लेती चली जा रही थी, चाहे वो पी.जे थॉमस की नियुक्ति हो, चीनी व् प्याज का निर्यात हो, इसरो देवास की ओर बढ़ाये गए पग हों, टू जी व् कोयला घोटाले की जांच से पीछे हटना हो, कॉमनवेल्थ घोटाले के आरोपियों का बचाव हो, और वहीँ दूसरी ओर कांग्रेस के मंत्रियों द्वारा अपने बचाव के लिए मूर्खतापूर्ण तर्क दिए जा रहे थे जिसने देश के नागरिकों के मन में यूपीए व् कांग्रेस के विरोध में रोष भर दिया दिया था,

तत्पश्चात जब अन्ना व् रामदेव का दिल्ली में आन्दोलन हुआ तो जनता की भागीदारी से यह स्पष्ट हो गया की जनता कांग्रेस के कुशासन से कितनी त्रस्त हो चुकी थी, किन्तु कांग्रेस ने जिस प्रकार इन आन्दोलनों को कुचलने का प्रयास किया चाहे वो अन्ना को बंदी बनाना हो या मध्य रात्री में भजन गाते अनशनरत भूखे राम देव समथकों कर लाठी चलाना हो, या दामिनी के लिए न्याय मांगने राष्ट्रपति भवन के बाहर एकत्र हुए युवाओं पर आंसू गैस के गोले, ठण्ड में पानी की बौछार, रब्बर की गोलियां व् लाठीचार्ज करना हो, इन सब घटनाओं ने जनता को कुपित कर दिया था और जनता ने कांग्रेस को अपने कोप का भाजन बनाने का निर्णय मन ही मन ले लिया था,

किन्तु उसी समय लोगों के मध्य आन्दोलन में भाग लेने वाले चर्चित चेहरे केजरीवाल, मनीष सिसोदिया योगेन्द्र यादव, शाजिया इल्मी, संजय सिंह, प्रशांत भूषण व् गोपाल राय एक राजनितिक दल बनाने का निर्णय ले चुके थे, निर्णय बहुत ही सोच समझकर लिया गया था, क्योंकि सभी बड़े आन्दोलन जो दिल्ली में हुए थे उनमें से अधिकतर आन्दोलनों में इन लोगों की भागीदारी थी और दिल्ली में इनका संगठन खड़ा हो चुका था, और यह लोग समझ चुके थे की वे जनता का विशवास जीत चुके हैं, परन्तु जब राजनितिक पार्टी बनाने की बात हुई तो केजरीवाल के गुरु अन्ना हजारे जिनकी छत्रछाया में ये इनका आन्दोलन आगे बढ़ा था ने स्पष्ट किया की वे राजनीति में नहीं आयेंगे क्योंकि वह ऐसा न करने के लिए जनता को वचन दे चुके हैं,

वैसे तो केजरीवाल व् उनके सभी साथी चाहे वो प्रशांत भूषण, हों शाजिया इल्मी हों, मनीष सिसोदिया हों संजय सिंह हो, गोपाल राय हो या योगेन्द्र यादव हो यह सब असंख्य बार यह कह चुके थे की उनके मन में कोई राजनितिक आकांक्षाएं नहीं है, और सम्भवतः इसी कारण इनके आन्दोलन को जनता का अपार समर्थन भी मिला, किन्तु उसके पश्चात भी अपने वचन का पालन न करते हुए यह राजनीति में आये, किन्तु मुझे इनके राजनीती में आने से कोई समस्या नहीं है, यह तो हर व्यक्ति का लोकतान्त्रिक अधिकार है की वह राजनीती में पदार्पण कर सकता हैं, मुझे यदि आपत्ति है तो इनके विरोधाभासी वक्तव्यों से, 

दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ने का निर्णय लेने के पश्चात केजरीवाल व् इनके साथियों ने चुनाव प्रचार में यह प्रचारित करने का प्रयास किया की केवल केजरीवाल की आम आदमी पार्टी “आप” ही इमानदार हैं, और कांग्रेस व् भाजपा में गठजोड़ है और यह दोनों ही पूर्णतः भ्रष्ट हैं, केजरीवाल सदैव कहते रहे की कभी इन दोनों दलों से हाथ नहीं मिलायेंगे, यह बात तो केजरीवाल ने अपने बच्चों की कसम खाकर कही थी की न कांग्रेस व् भाजपा को समर्थन देंगे न लेंगे
 
http://www.youtube.com/watch?v=yOutxpoXnfg&feature=youtu.be

किन्तु जिस व्यक्ति ने अपने बच्चों की कसम का मान न रखा वह अपने अन्य वचनों व् दिल्ली की जनता की अपेक्षाओं का कितना मान रखेगा इसका उत्तर तो समय ही दे सकेगा,

अब ध्यान दें की जनता को अपनी ओर आकर्षित करने हेतु राजनितिक व् चुनावी लाभ के लिए “आप” के द्वारा बिना अध्यन व् विचार किये बिना सोचे समझे बड़े बड़े चुनावी वचन दिए गए, जिनमें

>बीजली के दाम आधे करने की बात कही गयी अब कहा जा रहा है की पहले ऑडिट होगा फिर जो परिणाम आयेंगे उसके अनुसार दाम कम होंगे पूरी प्रक्रिया में ४-५ माह लग सकते हैं,

>हर दिल्लीवासी को सात सौ लिटर पानी देने के लिए कहा गया अब कह रहे हैं जहाँ पानी की अत्यधिक समस्या है वहां पानी उपलब्ध करवाया जायेगा,

>पांच सौ नए स्कूल व् चिकित्सालय खोलने की बात कही गयी किन्तु किस प्रकार और फंड के विषय में कोई बात जनता को अब तक स्पष्ट रूप से नहीं बताई गयी,

>महिलाओं की सुरक्षा के लिए कमांडो फ़ोर्स के गठन की बात कही गयी किन्तु यह फ़ोर्स क्या होगी? गठन कैसे होगा उस प्रक्रिया पर भी रहस्यमयी चुप्पी हैं,

>तीन लाख पचार हजार अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी सरकारी रोजगार देने की बात कही गयी, फिर कहा गया नहीं कुछ विभागों के कर्मचारियों को स्थायी करेंगे,

>जनलोकपाल बिल लाने जैसे आश्वासन दिए गए किन्तु वह केवल लोकसभा में पारित हो सकता था,  और अब लोकायुक्त के लिए भी संवेधानिक अड़चन की बात कही जा रही है

जैसे वचन सम्मिलित हैं,

इसके पश्चात कुछ स्टिंग ओपरेशन भी सामने आये जिसमें शाजिया इल्मी व् “आप” के कई अन्य बड़े नेता अनैतिक रूप से चंदा लेते दिखे व् कुछ उम्मीदवार तो चुनाव जीतने के पश्चात अपनी शक्ति का दुरूपयोग कर धन के बदले लोगों को लाभ पहुँचाने तक की बात करते हुए कैमरे पर दिखे, 

परन्तु “आप” और केजरीवाल जो दूसरों पर अनैतिक कृत्यों में सम्मिलित होने का आरोप लगाते नहीं थकते थे उन्होंने इस सबको एक राजनितिक षड्यंत्र का भाग बताया, व् अपना पल्ला झाड लिया, इन सब घटनाओं ने यह सुनिश्चित कर दिया की अपने आपको दूसरों से अलग बताने वाले केजरीवाल व् “आप” कोई पवित्र गाय नहीं है बल्कि वह भी उन्ही राजनितिक दलों में से एक हैं जिनका विरोध कर वे इस स्थान तक पहुंचे हैं,

किन्तु जैसे यह भी पर्याप्त नहीं था तो अल्पसंख्यकों विशेषकर मुस्लिमों के वोट पाने के लिए बरेली दंगों के आरोपी मौलाना तौकीर रजा से लेकर बहुसंख्यकों के विरुद्ध विष वमन करने वाले जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी तक से समर्थन लिया गया और उनसे अपने लिए चुनाव प्रचार करवाया गया, और यह तक कहा गया की की मुस्लिमों को ग्यारह प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए, जब यह सर्वविदित है की धार्मिक आधार पर आरक्षण संविधान के विरुद्ध है,

अब युवा पीड़ी को साधने के लिए जिन व्यक्तियों को राजनीती की समझ तक नहीं थी जो टीवी पर अभद्र व् अशिष्ट भाषा के लिए जाने जाते हैं उन्हें बुलाकर युवाओं को लुभाने के लिए उनसे प्रचार करवाया गया व् इन टीवी कलाकारों से ऐसी भाषा व् शब्दों का प्रयोग करवाया गया जिसे सभ्य व् शालीन की संज्ञा नहीं दी जा सकती, सम्भवतः आज के परिपेक्ष में यह कोई बड़ा विषय नहीं है, परन्तु जो अपने आपको सर्वश्रेष्ठ राजनितिक दल बताते हों उनसे इस प्रकार के कृत्य की अपेक्षा नहीं की जा सकती

अब विडंबना देखिये की "आप" के समर्थकों और "आप" के नेताओं की विचारधारा में स्वयं कितना विरोधाभास है की मल्टीनेशनल में कार्यरत युवा जो इनका झंडा उठा कर प्रचार कर रहा था जो की आरक्षण, साम्य्वादिता व् सम्प्रदायिकता व् तुष्टिकरण का धुर विरोधी है वह भी इनका साम्यवादी व् साम्प्रदायिक दृष्टिकोण समझने में असमर्थ रहा की यहाँ तो उनका पार्टी के नेतृत्व की विचारधारा का सीधा टकराव है, किन्तु उस वर्ग के मन पर ये ऐसी छाप छोड़ चुके थे की उसने इनके द्वारा प्रयोग किये हर कूटनीति व् हथकंडे पर कभी कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया वे इनके हर तर्क को बिना किसी वितरक के स्वीकार करते चले गए

सम्भवतः राजनितिक रूप से अपरिपक्व मतदाताओं ने कांग्रेस के प्रति उपजे आक्रोश में दिल्ली में हुए आन्दोलनों में इनके प्रति उपजी सहानुभूति के कारण इनकी विचारधारा का मुल्यांकन ही नहीं किया, और भावनाओं के बहाव में आकर “आप” को अपार समर्थन प्रदान किया और परिणाम स्वरुप “आप” ने दिल्ली विधानसभा के चुनावों में अट्ठाईस सीटें जीतकर इतिहास रच दिया.

किन्तु इसके पश्चात जो घटनाक्रम धटित हुआ वह अप्रत्याशित था, भाजपा ने बत्तीस सीटें होने के बाद विपक्ष में बैठने का निर्णय लिया और कांग्रेस ने लेफ्टिनेंट गवर्नर को “आप” को समर्थन देने का पत्र दे दिया, फिर केजरीवाल ने अपना एक निजी जनमत संग्रह करवाया जिसकी प्रमाणिकता को शंकास्पद होने से नकारा नहीं जा सकता उस जनमत संग्रह में यह दावा किया गया की दिल्ली की जनता सरकार बनाने के पक्ष में हैं, किन्तु रहस्यमयी रूप से जनता से यह नहीं पुछा गया की क्या “आप” को कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनानी चाहिए? किन्तु इसके पश्चात अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री बनने का निर्णय लिया और मुख्यमंत्री पद की शपथ ली...

कई लोग मुझपर नकारात्मक दृष्टिकोण होने का आरोप लगा सकते हैं, किन्तु सम्भवतः इन लोगों ने भारतीय राजनीती के इतिहास का अध्यन नहीं किया है, क्योंकि एक काल खंड में लालू यादव भी घोर कांग्रेस-विरोधी हुआ करते थे रिक्शे से विधानभवन जाया करते थे, और लालू उस समय पिछड़ों व् गरीबों के मसीहा के रूप में जाने जाते थे किन्तु वही मसीहा कब देश के सबसे भ्रष्ट नेता में सम्मिलित हो गया लोग समझ ही नहीं पाए, और अब  राजनितिक लाभ के लिए लालू उसी कांग्रेस से जा मिले जिसके वो विरोधी हुआ करते थे,

वही स्थिति चिरंजीवी की प्रजाराज्यम के साथ हुई, विश्वनाथ प्रताप सिंह भी कांग्रेस के धुर विरोधी हुआ करते थे, किन्तु प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस से समर्थन लेते रहे और उसी वी.पी सिंह ने भारतियों को अगड़े, पिछड़ों, अनुसूचित जाती व् अनुसूचित जनजाति की खाईयों में ऐसा बांटा की अब देश की एकता ही संकट में आ खड़ी हुई है, ऐसे एक नहीं कई उदाहरण है की लोहिया व् जयप्रकाश आन्दोलनों से निकले कई राजनेता जो कांग्रेस के विरोधी हुआ करते थे वे अंत में कांग्रेस से ही मिल गए और अंत में उन्हें समर्थन देने वाली जनता ही छली गयी,

और यहाँ भी मैं उसी राजनितिक इतिहास व् राजनितिक घटनाक्रमों की पुनरावृत्ति होती देख रहा हूँ, की जिस पार्टी ने कांग्रेस के विरुद्ध शुचिता, निष्पक्षता व् निष्कपटता की बात कर चुनाव लड़ा था अब वह सत्ता के लोभ में उसी महाभ्रष्ट कांग्रेस से गठजोड़ कर चुकी हैं और पुनः भारत की जनता व् मतदाता छले गए हैं, और विडंबना यह है की अधिकतर आम आदमी जिन्होंने इन्हें वोट दिया था वो अभी तक इस कटु सत्य से अनभिग्य हैं और इस सत्य को स्वीकारने के लिए उद्यत नहीं हैं

Tuesday, September 4, 2012

आरक्षण का औचित्य वह दुष्परिणाम


आज आरक्षण राजनैतिक दलों के लिए वोट पाने का एक अस्त्र बन चुका है, और हर राजनैतिक दल इस अवसरवादी व तुष्टिकरण कि राजनीती में निपुण है, आज कि राजनीती के मायने बदल चुके है, एक कालखंड ऐसा था जब राजनीती देश हित के लिए की जाती थी, परन्तु आज राजनीती सिर्फ अपने स्वार्थ सिद्ध करने का साधन मात्र है,
जब आरक्षण लागु किया गया था तो सिर्फ १० वर्षों के लिए किया गया था, परन्तु उसके बाद से कभी भी इसे हटाने कि बात नहीं कि गयी, यदि पिछले ६५ वर्षों में इस आरक्षण से किसी का भला नहीं हुआ तो अब ये समझने का समय आ गया है कि, ये तुष्टिकरण का प्रयोग विफल हो चुका है,
परन्तु हमारे नेतागण अपने वोट बैंक के लालच में एक वर्ग के लोगों के अधिकारों का दोहन कर उनके अधिकार दुसरे वर्ग के लोगों में बाँट रहे हैं, जो कि अन्याय है, लोकतंत्र कि परिभाषा ये है कि हर व्यक्ति को समान अधिकार होते हैं, परन्तु भारत के बारे में समझ नहीं आता कि ये कैसा विचित्र लोकतंत्र है जहाँ की सरकार खुद अपने नागरिकों के बीच भेदभावपूर्ण व्यवहार करती है,
मित्रों इससे पहले कि मैं आरक्षण के औचित्य कि बात करूं, आइये जरा पिछड़ेपन कि परिभाषा भी देख लें,  मैं हमारे नेताओं के जितना ज्ञानी तो नहीं हूँ, ना ही किसी विदेशी युनिवेर्सिटी में पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, परन्तु मेरे विचार से पिछड़ा व्यक्ति वह है जिसके पास ज्ञान का अभाव है,  हर वह व्यक्ति पिछड़ा है जिसके पास जीवन यापन करने के लिए आवश्यक साधनों का आभाव है, अब यदि इसके समाधान के बारे में विचार किया जाये, तो उत्तर यही निकल के आता है कि ये दोनों ही अवश्यकताएँ धन के जरिये ही पूरी की जा सकती है,  अर्थात देश का हर वह व्यक्ति जो गरीब है, कुलीन है, वह पिछड़ा है,
अब इसके बाद कोई भी ज्ञानी या बुद्धिजीवी मुझे ये बताये कि पिछडेपन का किसी जाती से क्या सम्बन्ध है ?  मैं जानना चाहता हूँ कि किस पुस्तक में लिखा है कि एक सामान्य वर्ग का व्यक्ति कुलीन नहीं हो सकता ? अरे भाई कुलीनता व निर्धनता जब किसी कि जाती व धर्म देखकर नहीं आती तो फिर आरक्षण जाती के आधार पर क्यों ? ये कहाँ का न्याय है ?

अब उदाहरण के जरिये हमारे देश कि विडम्बना देखिये,
सामान्य वर्ग के छात्र को अच्छे कालेज में प्रवेश के लिए जी तोड़ मेहनत करनी पड़ती है और ९०% अंक लाने पर भी उसका प्रवेश सुनिश्चित नहीं होता,  वहीँ तथाकथित पिछड़े वर्ग के छात्र कि सीटें तो भरनी ही है, कई बार तो ऐसा भी देखने में आया है कि २०% अंक वाले तथाकथित पिछड़े छात्रों को भी प्रवेश दे दिया जाता है, वहीँ ७५% अंक लाने वाले सामान्य वर्ग के छात्र प्रवेश से वंचित रह जाते हैं,
एक सामान्य वर्ग का छात्र यदि बैंक में क्लेर्क बनने के लिए आवेदन करता है, तो आवेदन भरने के लिए ३५० रुपये देने पड़ते हैं, वहीँ यदी कोई तथाकथित पिछड़ी जाती का व्यक्ति वही आवेदन करता है तो मात्र ५० रुपये में आवेदन कर लेता है , अब यही सामान्य वर्ग का छात्र यदि परीक्षा में ८५% अंक ले आये तब भी ये सुनिश्चित नहीं होता कि उसे नौकरी मिल जायेगी, परन्तु यदि तथाकथित पिछड़े वर्ग का छात्र यदि उस परीक्षा में  ४०%-५०% अंक ले आये तो उस छात्र को ८५% अंक लाने वाले पर तरजीह दे दी जाती है,  क्या ये अन्याय नहीं है ?

इतने सब के बावजूद भी हमारे राजनेताओं को सामान्य वर्ग के लोगों का शोषण करके शांति नहीं मिली, तो अब ये राजनैतिक दल अपने स्वार्थ के लिए पदोन्नति में आरक्षण लाने जा रहे हैं, यानि कि अगर किसी तरह एक सामान्य वर्ग के व्यक्ति को नौकरी मिल भी गयी, तो भी वो अपनी काबिलियत के बल पर कहीं पदोन्नति लेकर आगे ना बढ़ जाये, इसलिए अब पदोन्नति में भी आरक्षण करने कि तय्यारी हों रही है,
इन राजनैतिक दलों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सामान्य वर्ग के नागरिकों को उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है, इन्हें तो बस अपने लिए वोट कमाने है, भले ही वो इस देश के करोड़ों नागरिकों के अधिकारों कि बलि चढाकर इन्हें प्राप्त हों,
मित्रों मैं आज तक यह समझने में असमर्थ हूँ कि पदोन्नति में आरक्षण का औचित्य क्या है? जब एक तथाकथित पिछड़े वर्ग के व्यक्ति को नौकरी मिल गयी, तो अब वो कहाँ से पिछड़ा रहा? और यदि वो अब पिछड़ा नहीं है तो फिर आरक्षण किस बात का?
मित्रों इस आरक्षण के दुष्परिणाम ये होंगे कि काबिलियत की कोई कीमत नहीं रह जायेगी,  तथाकथित पिछड़ा वर्ग का व्यक्ति इसलिए काम नहीं करेगा कि वो तो कोटे से आया है, और उसे तो हर हाल में पदोन्नति मिलनी ही है, वहीँ सामान्य वर्ग का व्यक्ति काबिल होने के बावजूद कुंठा ग्रस्त हों जायेगा, क्योंकि वह जानता है कि वो बेहतर है ज्यादा काबिल है,  उसके बावजूद उसे पदोन्नति नहीं मिलेगी, और इसलिए वह काम से पीछे हटेगा,  इसका परिणाम ये होगा की अंततः इस देश का ही नुक्सान होगा,  और इन दोनो वर्गों के बीच में वैमनस्य फैलेगा क्योंकि सामान्य वर्ग का अधिकार छीना जा रहा है, तो स्वाभाविक सी बात है कि इसके लिए वे नेताओं और दुसरे वर्ग के लोगों को ही उत्तरदायी ठहराएंगे
मित्रों नेताओं का ये प्रयास पिछडों को मुख्यधारा से जोड़ने का नहीं है, अपितु ये तो एक षड्यंत्र है जो हमारे समाज में द्वेष वह वैमनस्य फैला कर दो वर्गों के बीच कि खाई को और बढाकर, अपना वोट बैंक बढ़ाने का है,  ये वही अंग्रेजों द्वारा अपनाई गयी नीति है “बांटो और राज करो”,  और हमारी भोली भाली जनता इस षड्यंत्र को समझने में विफल है, और इसका परनाम इस पूरे राष्ट्र को भुगतना पड़ेगा

मित्रों खेद का विषय ये हैं कि भाजपा भी इस राष्ट्र विरोधी कदम का विरोध करती नहीं दिख रही है, और संभवतः आगामी लोकसभा चुनाव में इसका फायदा उठाने के लिए चुपचाप इस संविधान संशोधन का मौन सहमति से समर्थन करती दिख रही है,
आज इस देश के राजनैतिक मूल्य इतने गिर चुके हैं, कि सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों के हितों की बलि चढाकर ये राजनैतिक दल अपनी वोट बैंक कि रोटियां सेंकने का प्रयास कर रही है, परन्तु इन्हें न्यूटन का सिद्धांत नहीं भूलना चाहिए जो कहता है कि “every action has an equal and opposite reaction”,
जो वर्ग आज तक अपने अधिकारों के छिनने के बावजूद शांत बैठा है, अगर उसे और दबाया गया तो इसका परिणाम भयावह होगा, आखिर सहनशक्ति कि भी एक सीमा होती है, और जब वो सीमा पार हो जाती है, तो व्यक्ति अपने अंदर दबे क्रोध को प्रकट करने के लिए बाध्य हो जाता है,

राजनेताओं को ये नहीं भूलना चाहिए कि किसी एक वर्ग के अधिकार छीन कर दुसरे वर्ग को देना अन्याय कि श्रेणी में आता है और एक कहावत है, “when injustice becomes law rebellion becomes duty” अर्थार्थ “जब अन्याय ही कानून बन जाये तो विद्रोह करना मनुष्य का धर्म बन जाता है”
और यदि कोई आरक्षण कि राजनीती करने वाला कोई नेता इसे पढ़ रहा हो तो इतना जरूर समझ ले, कि इस देश का हर व्यक्ति अपना विरोध अनशन करके अहिंसक तरीके से और मोमबत्तियाँ जलाकर नहीं दर्ज कराता, इस देश के लोगों में कहीं ना कहीं एक सुभाष चन्द्र बोस, एक भगत सिंह, एक उद्दम सिंह, एक चंद्रशेखर आजाद, एक राजगुरु और एक मंगल पाण्डेय है
इसलिए अपने भले और देश के भले को ध्यान में रखते हुए नेतागण ऐसी नौबत ना आने दें कि देश के युवा वर्ग को कोई ऐसा मार्ग अपनाना पड़े जो की इन तथाकथित चुने हुए लोगों को बहोत भरी पड़ जाये

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